गाँव के बेहतर भविष्य का आधार है उत्तर प्रदेश पंचायत कल्याण कोष। इसके जरिए सीधे स्थानीय समुदाय को मजबूती मिलती है। जहाँ विकास की जड़ें गहरी होती हैं, वहीं बदलाव टिकता है। इस फंड से छोटे-छोटे प्रयोग बड़े असर दिखते हैं।
कई बार सफलता अनदेखे काम में छिपी होती है
पुराने ज़माने में हुए बदलावों के बीच इसकी शुरुआत हुई। धीरे-धीरे समय के साथ यह आकार लेता गया।
इस कोष की शुरुआत 1992 में संविधान में आए 73वें सुधार के बाद हुई, जब गाँव की पंचायतों को कानूनी ताकत मिली। राज्य सरकार ने पंचायती राज कानून के तहत इसका गठन किया, ताकि ग्रामीण सरकारों को पैसे के मामले में मजबूती मिल सके। गाँव के निकायों को काम करने की आजादी देने के लिए यह व्यवस्था बनी। ग्रामीण इलाकों में तीसरे स्तर की सरकार को टिकाऊ बनाने में यह कोष अहम भूमिका निभाता है।
लक्ष्य को समझने में गहराई होनी चाहिए। नज़र आगे बढ़कर रखी जाए।
इस फंड के मुख्य लक्ष्यों में आता है:
गाँव की पंचायतों को पैसे का भरोसेमंद स्रोत मिलना चाहिए। इससे उनके हिस्से का फंड बरकरार रहेगा। जब आमदनी सुनिश्चित होगी, तभी वे अपने-अपने इलाके में काम संभाल सकेंगे। ऐसे में बजट के झटकों से छुटकारा मिलेगा। योजनाओं को ठीक से संचालित कर पाना संभव होगा।
गाँवों में पक्की सड़कों का जाल फैलता है, छोटे-छोटे पुलिये नालों पर बनते हैं। बारिश के पानी के लिए नालियों की व्यवस्था देखी जाती है। सभा के लिए ऐसा स्थान बनता है जहाँ सब मिल सकें। मृत्यु के बाद क्रियाकर्म के लिए घाट की सुविधा भी उपलब्ध होती है। इन सबकी मरम्मत और देखभाल का ध्यान रखा जाता है।
सामाजिक कल्याण एवं सेवा वितरण:
स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता, महिला एवं बाल विकास जैसी सेवाओं के लिए बुनियादी ढाँचा तैयार करना और उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना।
लोगों की शामिली बढ़ाने के लिए गाँव की सभा को मजबूत किया जाए, ताकि आसपास के निवासी खुद को विकास में जोड़ सकें।
हर किसी के बढ़ने का मौका होना चाहिए। इसमें आदिवासी और दलित समुदाय के लोग भी शामिल हैं। महिलाओं की प्रगति पर खास ध्यान देने की जरूरत है।
गरीबी में जीवन गुजार रहे लोगों को भी आगे बढ़ाया जाए
हर साल काम के अवसर बढ़ते हैं। कई नए काम शुरू हो जाते हैं, वहीं पुराने ढंग धीरे-धीरे बदलने लगते हैं।
गतिविधियों को जब कोष से पैसा मिलता है, तो वे अलग-अलग ढंग से काम करने लगती हैं।
गाँव की सड़कें, जो पीएमजीएसवाई में शामिल नहीं हैं, सख्त घाट बने हुए हैं। साथ में कई इलाकों में साझा शौचालय भी उपलब्ध हैं। पानी के लिए टंकी लगाई गई है। हर तरफ हरियाली के बीच पार्क दिखते हैं। खेल के लिए मैदान हैं, जहाँ स्टेडियम भी बने हैं।
गाँवों में साफ-सफाई के लिए ठोस कचरे का उचित इंतजाम हुआ। तरल अपशिष्ट को संभालने के लिए खूब सोख्ता गड्ढे बनाए गए। इसके बाद, आम लोगों के लिए नल कनेक्शन भी लगाए गए। यह सब स्वच्छ भारत मिशन के तहत किया गया काम है।
बुजुर्गों के लिए घर, विधवाओं की छत, अपंग लोगों के काम के स्थान – इनकी देखभाल होती है।
हर गाँव में पंचायत के लिए अलग इमारत बनी। काम में आसानी हो, इसलिए कंप्यूटर लगाए गए। ऑनलाइन सुविधाओं के ज़रिए काम होने लगा। जो लोग पंचायत में काम करते हैं, उन्हें प्रशिक्षण दिया गया।
जब बाढ़ या सूखे जैसी मुसीबत आती है, तब तुरंत मदद के लिए पैसे का इंतजाम होता है।
वित्तीय संरचना एवं संसाधनों का प्रबंधन:
इस फंड को पैसा मिलता है एक ऐसे ढांचे से, जो अलग-अलग स्तरों पर काम करता है।
हर साल मिलता है धन, राज्य को – वित्त आयोग की सलाह पर टिका हुआ है यह प्रावधान।
केंद्र सरकार की तरफ से चल रही योजनाओं में 14वें और 15वें वित्त आयोग के जरिए मिलने वाला अनुदान शामिल है। इनमें ऐसी परियोजनाएँ भी हैं जिन्हें केंद्र खुद चलाता है, उदाहरण के तौर पर मनरेगा या फिर स्वच्छ भारत मिशन। राज्य को इनके लिए धन का एक हिस्सा देना पड़ता है।
वित्तीय मदद कई बार अलग-अलग देशों के लिए आती है। इनमें से कुछ पैसा विश्व बैंक के जरिए भी आता है। कभी-कभी एशियाई विकास बैंक भी ऐसे कामों में योगदान डालता है। परियोजनाओं को चलाने के लिए ये फंड उपयोगी होते हैं। जगह-जगह के संसाधनों में शामिल है।
पंचायतों के जरिए इकट्ठा किए गए करों और फीस का कुछ हिस्सा
इस योजना में पैसे का बँटवारा सीधे राज्य से जिला पंचायत तक होता है। फिर वह खंड या KS पंचायत तक पहुँचता है। ग्राम पंायत तक पहुँचने से पहले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे eGramsvas या PFMS इसे संभालते हैं। ऐसा करने से गलत जगह पैसा जाने की संभावना कम हो जाती है।
संगठन के अंदर प्रबंधन तथा जांच संरचना:
ऊपरी स्तर पर, पंचायती राज का इंचार्ज राज्य सरकार होती है जो नियम बनाकर चलाती है। फैसले होते हैं वहाँ – बजट का भारी आवंटन, ऊपरी स्तर की दिशा तय होती है एक समिति के ज़रिए।
कहाँ तक ज़िम्मेदारी है, इसे देखा जाए तो जिला पंचायत और DPRO के काम में कोष का बंटवारा, उपयोग और ध्यान रखना शामिल है।
इसके बाद आता है ब्लॉक स्तर। वहाँ क्षेत्र पंचायत होती है। यही ब्लॉक प्रमुख काम करता है। जैसे एक डोर खींचकर ऊपर नीचे जोड़ती है, ऐसे ही ये मध्यवर्ती कड़ी बनती है।
लाभ के आखिरी पड़ाव पर, गाँव की पंचायत और सरपंच पैसे का इस्तेमाल करते हैं। गाँव की सभा, जो चुपचाप नज़र रखती है, जनता के बीच जवाबदेही सुनिश्चित करती है।
प्रगति की जाँच लगातार होती रहती है। ऑडिट के बाद डेटा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर खुले में दिखाया जाता है, जैसे पंचायत पोर्टल। ऐसा इसलिए कि लोग आसानी से अपडेट देख सकें।
प्रभाव एवं चुनौतियाँ:
गाँवों में सड़क, पानी जैसी सुविधाओं में बदलाव आया। पंचायतों ने अब खुद तय करना सीखा कि कौन-सा काम पहले हो। जिस चीज़ की ज़रूरत होती, उस पर तुरंत ध्यान दिया जाने लगा। इससे लोगों को लगने लगा कि गाँव चलाने में उनकी भी भूमिका है।
कई पंचायतों में पैसों का हिसाब रखने और टेक्नीकल जानकारी की कमी है। इसके अलावा, सियासी दबाव काम में आड़े आता है। कहीं-कहीं काम धीमे चलते हैं, खासकर जब ऊपर से फैसले लेने में वक्त लगता है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में एक जैसा विकास लाना भी मुश्किल हो जाता है।
निष्कर्ष:
उत्तर प्रदेश पंचायत कल्याण कोष राज्य के ग्रामीण परिवेश को बदलने में एक केंद्रीय भूमिका निभा रहा है। यह न केवल ईंट-गारे के निर्माण का साधन है, बल्कि स्थानीय लोकतंत्र, जवाबदेही और सामुदायिक भागीदारी की संस्कृति को पोषित करने का एक माध्यम भी है। प्रभावी क्रियान्वयन, निरंतर क्षमता निर्माण और सख्त निगरानी के माध्यम से यह कोष उत्तर प्रदेश के गाँवों को आत्मनिर्भर और समृद्ध बनाने की दिशा में एक शक्तिशाली उत्प्रेरक सिद्ध हो सकता है। यह ‘ग्रामोदय से भारत उदय’ के संकल्प को साकार करने की दिशा में एक मजबूत कदम है।